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2025 में दुनिया भर में 100 डॉलर से सस्ते करीब 17.3 करोड़ स्मार्टफ़ोन बिके, IDC की गिनती के अनुसार । ये पहले फ़ोन होते हैं: किसी किशोर के लिए, बुज़ुर्ग माता-पिता के लिए, या उसके लिए जो पहली बार इंटरनेट से जुड़ रहा है। विश्लेषक इन्हें शिपमेंट के रूप में गिनते हैं, यानी निर्माता जितने फ़ोन दुकानों और टेलीकॉम कंपनियों को भेजते हैं। 2026 की दूसरी तिमाही में सस्ते स्मार्टफ़ोन की शिपमेंट लगभग 60% गिर गई। माँग ग़ायब नहीं हुई। ग़ायब हुई वह मेमोरी, जिससे ये फ़ोन बनते हैं: उसे AI डेटा सेंटर ले गए।

पैमाने का अंदाज़ा लगाना आसान है। Nvidia का B300 एक्सेलरेटर, जो आज के AI सर्वरों का मुख्य घोड़ा है, 288 GB मेमोरी के साथ आता है । यह 4 GB वाले 72 सस्ते फ़ोन की कुल रैम के बराबर है। और फ़ोन के लिए खुद मेमोरी अब सबसे बड़ा ख़र्च बन गई है: Omdia के अनुमान से 200 डॉलर से सस्ते हैंडसेट में अब सभी पुर्ज़ों की लागत का लगभग 60% हिस्सा मेमोरी का है। स्क्रीन, कैमरा, बैटरी और बॉडी, चारों मिलकर भी मेमोरी चिप्स से सस्ते पड़ते हैं।

// AI के लिए मेमोरी का एक साल

≈60%2026 की दूसरी तिमाही में 100 डॉलर से सस्ते स्मार्टफ़ोन की वैश्विक शिपमेंट में गिरावट
≈350%IDC के अनुमान से फ़ोन की मेमोरी की लागत में साल-दर-साल बढ़ोतरी
−22%2026 की तीसरी तिमाही में सभी स्मार्टफ़ोन की शिपमेंट में गिरावट, अब तक की सबसे बुरी तिमाही

पूरी दुनिया के लिए तीन कारख़ाने

लैपटॉप से लेकर स्क्रीन वाले फ़्रिज तक, लगभग हर चीज़ की वर्किंग मेमोरी असल में तीन कंपनियों से आती है। Samsung, SK Hynix और Micron मिलकर वैश्विक बाज़ार का करीब 90% हिस्सा संभालती हैं। IDC में मोबाइल डिवाइस रिसर्च के निदेशक रेमन लामास ने Rest of World को बताया कि पिछले एक साल में तीनों ने अपनी आपूर्ति का भारी हिस्सा उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स से हटाकर AI डेटा सेंटरों की ओर मोड़ दिया है। तर्क सीधा है: डेटा सेंटर ज़्यादा पैसे देते हैं और कारख़ानों की बनाई हर चीज़ उठा लेते हैं।

AI एक्सेलरेटरों को एक ख़ास तरह की मेमोरी चाहिए, जिसे HBM यानी हाई बैंडविड्थ मेमोरी कहते हैं। इसकी चिप्स एक ऊँचे टावर की तरह एक-के-ऊपर-एक जमाई जाती हैं और प्रोसेसर के ठीक बगल में लगती हैं, ताकि डेटा तेज़ी से आ-जा सके। पेच यह है कि HBM बहुत भूखी है। इसका हर गीगाबाइट बनाने में कारख़ाने को सामान्य DDR5 के गीगाबाइट के मुक़ाबले करीब तीन गुना सिलिकॉन लगता है: उसी वेफ़र से एक-तिहाई बिट ही निकलते हैं। Micron इसे तीन-एक का अनुपात कहती है। डेटा सेंटर को भेजा गया हर गीगाबाइट उपभोक्ता उपकरणों की योजना से तीन गीगाबाइट काट देता है।

एक एक्सेलरेटर में कितने फ़ोन समाते हैं

अब एक मोटा हिसाब लगाते हैं। एक आम “100 डॉलर वाला फ़ोन” लें। 4 GB रैम और 128 GB स्टोरेज वाला Redmi A5 2025 में फ़िलीपींस में 4,099 पेसो में बिका, यानी करीब 74 डॉलर में।

एक AI एक्सेलरेटर की मेमोरी से दर्जनों सस्ते फ़ोन भरे जा सकते हैं
एक AI एक्सेलरेटर की मेमोरी से दर्जनों सस्ते फ़ोन भरे जा सकते हैं

क्षमता के हिसाब से यह वही 72 फ़ोन हैं, लेकिन तीन-एक का अनुपात जोड़ें तो चिप पर उतना सिलिकॉन लगता है जितना करीब 216 सस्ते फ़ोन में लगता। एक सामान्य सर्वर में ऐसे आठ एक्सेलरेटर होते हैं, कुल करीब 2.3 TB मेमोरी, यानी 1,700 से ज़्यादा फ़ोन के बराबर सिलिकॉन। और एक डेटा सेंटर एक सर्वर से नहीं, हज़ारों सर्वरों से बनता है।

इस अनुमान की धारणाएँ
  • फ़ोन में मोबाइल LPDDR मेमोरी लगती है, जबकि Micron का तीन-एक का आँकड़ा HBM की तुलना DDR5 से करता है। मोबाइल मेमोरी के लिए अनुपात कुछ अलग हो सकता है, इसलिए नतीजे को परिमाण का अंदाज़ा भर मानें।
  • सस्ते मॉडलों में 4 GB रैम ऊपरी सीमा है; कुछ में 3 GB आती है, जिससे फ़ोन की गिनती और बढ़ जाएगी।
  • फ़्लैश स्टोरेज (वे 128 GB) हिसाब में नहीं लिया गया, हालाँकि वह भी महँगा हुआ है।

आँकड़े मोटे हैं, पर निष्कर्ष मोटा नहीं है। मेमोरी अब कम पड़ रही है, और यह तय निर्माता करता है कि वह किसे मिले: मुँहमाँगे दाम देने वाले क्लाउड दिग्गज को, या 74 डॉलर का फ़ोन जोड़ने वाले को, जिसका मुनाफ़ा पैसों में गिना जाता है।

दूसरे के AI की क़ीमत कौन चुकाता है

Redmi A5 जैसा फ़ोन 2026 में पहले जैसा नहीं रह सकता। निर्माता के पास दो रास्ते हैं: दाम बढ़ाना या ख़ूबियाँ घटाना। Counterpoint के विश्लेषक देखते हैं कि ब्रांड दोनों कर रहे हैं: कम स्टोरेज, सादे कैमरे और कुछ दाम-श्रेणियों में 5G की जगह फिर से सिर्फ़ 4G वाले मॉडल। IDC के उपाध्यक्ष ब्रायन मा ने CNBC से कहा : “लो-एंड फ़ोन बनाना अब घाटे का सौदा बनता जा रहा है।”

यानी इंटरनेट की ओर पहला क़दम रखने वाले के लिए फ़ोन इसलिए महँगा हो रहा है कि कोई और न्यूरल नेटवर्क से बातें कर रहा है। मार भी सबसे ज़्यादा उन्हीं पर पड़ती है जिनके पास सबसे कम पैसे हैं। मोबाइल ऑपरेटरों के संगठन GSMA का अनुमान है कि 2025 के अंत तक निम्न और मध्यम आय वाले देशों के सबसे ग़रीब पाँचवें हिस्से के लिए एक बुनियादी स्मार्टफ़ोन पहले ही लगभग आधे महीने की कमाई के बराबर, यानी 44%, पड़ता था। सब-सहारा अफ़्रीका में यह तीन-चौथाई, यानी 76% है।

दाम हर जगह बढ़ रहे हैं, पर बराबर नहीं। उसी Counterpoint प्राइस ट्रैकर के मुताबिक़ 2026 की शुरुआत से मौजूदा मॉडल करीब 15% महँगे हो गए हैं, और नए लॉन्च पिछले साल से लगभग 25% महँगे आ रहे हैं। उछाल सबसे ज़्यादा उन बाज़ारों में दिखता है जहाँ ग्राहक दाम को लेकर संवेदनशील हैं: भारत में फ़ोन 21% महँगे हुए।

तुलना के लिए, अमेरिका में दाम सिर्फ़ 5% बढ़े, फिर भी वहाँ भी सस्ता सेगमेंट लगभग दो-तिहाई सिकुड़ गया। 100 डॉलर से सस्ते फ़ोन की बिक्री 2026 की दूसरी तिमाही में 64% गिरी : कुछ ब्रांडों ने इन्हें भेजना बंद कर दिया, कुछ ने दाम बढ़ा दिए।

तलहटी अभी नहीं आई

2026 की तीसरी तिमाही ने रेखा खींच दी। वैश्विक स्मार्टफ़ोन शिपमेंट 22% गिरकर 25.53 करोड़ इकाई रह गई , जो IDC के रिकॉर्ड में सबसे ख़राब नतीजा है। सबसे ज़्यादा चोट उन चीनी ब्रांडों को लगी जो सस्ते मॉडलों पर जीते थे। IDC की डिवाइस रिसर्च की वरिष्ठ निदेशक नबीला पोपल का मानना है कि बाज़ार अभी तली तक नहीं पहुँचा है। IDC 2028 से पहले सुधार की उम्मीद नहीं करता, और पूरे 2026 के लिए 16.7% गिरावट का पूर्वानुमान देता है, यानी कुल मिलाकर सिर्फ़ एक अरब से कुछ ऊपर फ़ोन।

थोड़ी राहत की बात भी है। मेमोरी अब धीमी रफ़्तार से महँगी हो रही है: IDC के अनुसार तीसरी तिमाही में लागत पिछली तिमाही से “दो अंकों के निचले स्तर” में बढ़ी, जबकि पहले हर तिमाही 50% से 100% बढ़ रही थी। सितंबर में ही ब्रायन मा ने CNBC को चेताया था कि रफ़्तार धीमी पड़ने का मतलब पलटाव नहीं है: क़िल्लत घटी तो दाम इतनी तेज़ी से चढ़ना बंद कर देंगे, लेकिन वापस नीचे नहीं आएँगे। यही क़िल्लत कंप्यूटरों को भी मार रही है: तीसरी तिमाही में दुनिया भर में PC की शिपमेंट 21% गिरी ।

40 डॉलर का फ़ोन अभी काग़ज़ पर ही जीता है

उद्योग जानता है कि वह क्या खो रहा है। मार्च 2026 में GSMA और छह बड़े ऑपरेटरों ने छह अफ़्रीकी देशों, यानी DRC, इथियोपिया, नाइजीरिया, रवांडा, तंज़ानिया और युगांडा, में 30 से 40 डॉलर के 4G फ़ोन का पायलट घोषित किया । घोषणा में ही माना गया कि महँगी मेमोरी के चलते इतनी कम क़ीमत तक पहुँचना कठिन है, और सरकारों से एंट्री-लेवल स्मार्टफ़ोन पर शुल्क और कर हटाने को कहा गया। ऐसे फ़ोन बिक्री पर आए हों, इसकी अब तक कोई ख़बर नहीं है।

दाँव पर गैजेट बाज़ार से कहीं ज़्यादा है। Rest of World का आकलन है कि करीब 80 करोड़ लोगों की इंटरनेट तक राह अब ख़तरे में है: GSMA उन्हें 2030 तक मोबाइल इंटरनेट पर देखना चाहता है, जबकि जिस सस्ते फ़ोन से उन्हें वहाँ पहुँचना था, वही दुकानों के काउंटर से ग़ायब हो रहा है।